यह अपील हमारी सामूहिक निराशा की अभिव्यक्ति है और हम किसी सरकार की बजाय सीधे देश की आम जनता से मुखातिब हैं.

यह अपील नारायण देसाई, प्रशांत भूषण, वन्दना शिवा, प्रफुल्ल बिदवई, ललिता रामदास, बिनायक सेन, पार्थ चटर्जी, आनंद पटवर्धन, ज्ञानी शंकरन, अचिन वनायक, सुरेन्द्र गाडेकर, सुनील, हिमांशु कुमार, शबनम हाशमी और संदीप पाण्डेय समेत सैकड़ों भारतीय नागरिकों के समर्थन से जारी की गई है.

आप अपना हस्ताक्षर DiaNuke.org पर दर्ज कर सकते हैं या सीधे [email protected] पर भेज सकते हैं.

यह अपील दिल्ली में 20 मई शाम छः बजे इंडिया गेट पर प्रसिद्ध पर्यावरणविद वन्दना शिवा की मौजूदगी में जारी की जाएगी. आपका स्वागत है.

मुंबई में यह अपील 20 मई शाम साढ़े छः बजे चैत्यभूमि, दादर में मानवाधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन और फिल्मकार आनंद पटवर्धन की मौजूदगी में जारी की जाएगी. आपका स्वागत है.

हम आपसे अनुरोध करते हैं कि आप अपने शहर में इस अपील पर हस्ताक्षर जुटाएं, इसे लोकार्पित करें और इसका सार्वजनिक पाठ आयोजित करें.

भारत के प्रिय सह-नागरिकों,

आज जब एक तरफ जम्हूरी शासन के शिखर  – हमारी संसद – के साठ साल पूरे होने का जश्न मनाया जा रहा है, कुर्बानियों और संघर्षों से हासिल हमारी लोकतांत्रिक आज़ादी बर्बरतापूर्वक कुचली जा रही है. विनाशकारी विकास की तेज दौड और इसके लिए परमाणु ऊर्जा के उत्पादन हेतु पूरी तरह शांतिप्रिय और वाजिब जनांदोलनों को बलपूर्वक दबाया जा रहा है. साधारण आदमियों, औरतों और बच्चों की कोई सुनवाई नही है. कूडनकुलम में हाल ही में लोगों ने अपने नागरिकता के निशान – अपने मतदाता पहचान-पत्र – सामूहिक रूप से वापस किए. क्या सरकार से हताशा और असहमति दर्ज कराने का इससे तीखा कोई तरीका हो सकता है?

हाल के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन और हक, इन्साफ, रोज़गार तथा प्राकृतिक संसाधनों, अपनी जीवन-पद्धति और गरिमा की रक्षा के लिए देश भर में चल रहे दूसरे आन्दोलनों की तरह अपने लिए सुरक्षित भविष्य की मांग कर रहा कूडनकुलम के आम लोगों का आंदोलन सरकारी हिंसा और दमन तथा बेरुखी का शिकार हो रहा है. इस मामले पर हमारे मुख्यधारा के मीडिया की चुप्पी भी दुर्भाग्यपूर्ण है.

कूडनकुलम के साथियों को 14 –दिन तक चली अपनी भूखा-हडताल इस हफ्ते वापस लेनी पड़ी है. यह सचमुच विचलित करने वाली बात है कि सैकड़ों अनशनरत औरतों और आदमियों से बात करने केद्रीय सरकार या तमिलनाडु सरकार की तरफ से कोई भी नहीं आया और इस बीच उनको डराने-धमकाने – जिसमें उनके राशनकार्ड छीनना तक शामिल है – की हर कोशिश जारी रही.

यह आकस्मिक अपील हम आपसे हताशा की स्थिति में कर रहे हैं.

भारत के ऊर्जा-भविष्य पर बहस अभी किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँची है. हमारे देश की ऊर्जा नीति जन-केंद्रित, पर्यावरण-हितैषी और टिकाऊ हो, इसके लिए व्यापक बहस, नीति-विमर्श और आम-सहमति बनाने की ज़रूरत है.

कूडनकुलम के रिएक्टर-परियोजना में कई सारे नियमों, मानकों, प्रक्रियाओं और सवालों का अस्वीकार्य उल्लंघन किया गया है. बरसों से शातिप्रिय तरीके से आंदोलनरत स्थानीय जन-समुदाय ने कूडनकुलम परियोजना और परमाणु-ऊर्जा से जुड़े व्यापक खतरों पर आधारित कई ज़रूरी सवाल उठाए हैं. कई सारे स्वतंत्र वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने भी कूडनकुलम रिएक्टर शुरू करने के भारी खतरों के प्रति देश को आगाह किया है.

इस निर्णायक घड़ी में, हम यह अनुरोध करना चाहते हैं कि परमाणु-ऊर्जा के व्यापक विस्तार  के जिस रास्ते पर सरकार देश को ले जा रही है, इससे पहले हमारे समाज में एक साफ़ और निष्पक्ष बहस ज़रूरी है.

यह ज़रूरी है कि हम अपने देश के लोकतंत्र और इसकी आत्मा को बचाने के लिए एकजुट होकर आवाज़ उठाएं. कूडनकुलम संघर्ष पर हो रहे सरेआम अत्याचार और जन-स्वर के खुले दमन जैसी अस्वीकार्य घटनाओं से दरअसल हमारे सभी व्यक्तिगत और सामूहिक संघर्षों के सामने गलत मिसाल पैदा होता है.

सादर,